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ब्रह्मांचल पर्वत से प्राकट्य हुई थी वृषभानु नंदिनी
तमिलनाडु के मदुरैपट्टनम में जन्मे श्रील् नारायण भट्ट जी करीब साढ़े पांच सौ वर्ष पहले ब्रज में आये थे, उस समय समूचा ब्रज लुप्त था। राधारानी के परम भक्त श्रील् नारायण भट्ट जी ने ब्रहमांचल पर्वत से करीब साढ़े पांच सौ वर्ष पहले वृषभानु नंदिनी की कृपा से उनके दिव्य श्री विग्रह का प्राकट्य किया था। उन्होंने अपने परम शिष्य श्री नारायण स्वामी जी को श्री विनाह की सेवा पूजा का भार सौंपा था। तभी से श्री नारायण स्वामी जी के वंशज बरसाना के गोस्वामी जन श्री राधारानी की पूजा करते आ रहे हैं।
वर्तमान में पांचवें महल में विराजमान हैं प्रिया-प्रियतम
अकबर सहित कई मुगलकालीन राजाओं ने कराया या मंदिर का निर्माण
करीब साढ़े पांच सौ वर्ष पहले श्रील् नारायण भट्ट जी ने ब्रह्मांचल पर्वत से राधारानी के दिव्य विग्रह का प्राकट्य किया था। उस समय मुगल काल के लक्खा बंजारे ने सर्वप्रथम राधारानी के लिए भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। अकबर की हिंदू पत्नी जीचा बाई के कहने पर राजस्व मंत्री टोडरमल ने दूसरे मंदिर का निर्माण करवाया। इसके बाद रीवा व ग्वालियर राज्यों के राजाओं ने भी मंदिर का निर्माण करवाया। कुछ वर्ष पश्चात् जब यह मंदिर खंडहर होने लगे तो करीब सौ वर्ष पहले किशोरी जी के परम सेवक श्री हरगुलाल सेठ ने उन्हीं में से एक प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार कर नया रूप दिया। आज प्रिया प्रियतम उसी पांचवें मंदिर में विराजमान होकर भक्तों पर अपनी कृपा बरसा रहे हैं। दूर से देखने में यह मंदिर किसी राजमहल से कम नहीं लगता है। सभी धर्मों का समावेश इस मंदिर में छिपा है। लाडिली जी मंदिर जाने के लिए तीन मार्ग सीढ़ियों सहित एक अन्य मार्ग गाडियों का भी है। श्रीजी मंदिर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रोप वे का निर्माण कार्य भी शुरू हो चुका है।
श्रीधाम बरसाना एक परिचय
श्रीवृषभानु जी की राजधानी होने के कारण बरसाने का प्राचीन नाम श्री वृषभानुपुर था। वाराहपुराण एवं पद्मपुराण में ऐसी कथा आती है कि ब्रहमाजी ने तपस्या के बल पर श्रीकृष्ण से लीला-दर्शन का वरदान प्राप्त किया था। फलस्वरूप लीला दर्शनार्थ वे ब्रहमांचल के रूप में यहां स्थापित इस पर्वत को वृहत्सानु पर्वत के नाम से हुए। इसलिए हैं। ब्रहमाजी के चार्तुमुखी स्वरूप के समान यहां वृहत्सानु की चार चोटियां हैं-
भानुगढ़, दानगढ़, विलासगढ़ तया मानगढ़।
- भानुगढ़ पर श्री लाडिली जी का मन्दिर विराजमान है।
- दानगढ़ श्रीकृष्ण की दानकेलि का पवित्र स्थान है।
- विलासगढ़ श्री राधा-कृष्ण की वय-सन्धि के समय सम्पन्न विलासलीला का स्थल है।
- मानगढ़ मानिनी श्रीराधिका और विनयावनत श्रीकृष्ण की पारस्परिक प्रेम-लीला का परिचायक है।
मन्दिर में श्री मानबिहारी लाल के दर्शन हैं। मोरकुटी पर श्री श्यामसुन्दर ने मोर बनकर नृत्य करते हुए अपनी श्यामा जू को रिझाया था। गहवर वन की सघन निकुंजें श्री राधा-माधव की सरस केलि की सहज नियोजिका है। इसके निचले भाग में रासमण्डल है, राधा सरोवर है, शंख का चिन्ह दर्शन है और महाप्रभु बल्लभ जी की बैठक है। वहां पर श्री गोपाल जी के दर्शन हैं। यह सम्पूर्ण ब्रजभूमि स्वयं श्रृंगाराख्य भवरूपा है। तत्स्वरूपा होने के साथ उस परमभाव की भांति उन्मादना उत्पन्न करने में भी पूरी तरह समर्थ है। तभी तो स्वयं रसराज यहां इस राधिका-केलि-महल की किंकरियों के समान महाभावस्था नन्दिनी की कृपा की अभिलाषा लिए सदा रहते हैं-
यह वृषभानुपुर अथवा श्रीधाम बरसाना है गिरिराज गोवर्धन से पश्चिम दिशा में लगभग पच्चीस कि. मी. इसके उत्तर में गाजीपुर और रावा के प्रिय सखी चंद्रावली का रिवेरा गांव है। पश्चिम दिशा में ललिता सखी का ऊंचागांव है। पूर्व में कमई और दक्षिण-पूर्व में चित्रा सखी का गांव विकलौली है। इसकी दक्षिण दिशा में सुनहरा देवी का गांव है। इस सम्पूर्ण भू-भाग की परिक्रमा लगभग 6 कि. मी. है। इस क्षेत्र में दो पर्वत शिखर आमने-सामने बो दिखाई देते हैं। मध्य भाग सांकरीखोर यानि संको गली के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रजबालायें इसी सांकरीखोर से दही-दूध लेकर निकलती थी। जिहें श्यामसुन्दर मध्य मार्ग में रोक लेते थे। इस सांकरी खोर में श्री कृष्ण की हथेली चिन्ह के दर्शन आज भी दर्शनीय हैं। गोपियों की मटकियों के चिन्ह भी मौजूद हैं। पद्मपुराण के अनुसार दक्षिण पार्श्व का शिखर विष्णु पर्वत माना गया है। भाद्रशुक्ला त्रयोदशी ते पूर्णिमा पर्यन्त इस क्षेत्र विशेष में श्री नारायण भट्टजी प्रवर्तित बूढ़ी लीलाओं का प्रदर्शन होता है। ब्रहमापर्वत अथवा ब्रहमगिरी पर स्थित श्री लाडिली जी के मन्दिर में श्री लाडिलीजी एवं श्री लाडिली लाल विराजमान हैं। मन्दिर विशाल एवं भव्य है। शिखर पर
आने के लिए पर्याप्त सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। परकोटे में प्रवेश हेतु कलात्मक द्वार है। इसके निर्माता वे- श्री मदन मोहन भंडारी। भीतरी भाग दर्शनीय है। प्राचीन देवालयों के समूह विशेष जिनमें समय-समय पर लाडली जू विराजती रही हैं। इन देवालयों के निर्माता राजा नरसिंह देव, लाखा बंजारा, रूपराम कटारा एवं मायवराज सिंधिया बताये जाते है। वर्तमान में मन्दिर के जीर्णोद्धार हेतु लाला हरगुलाल बेरीचाले और सेठ जानकी दास के स्तुत्य प्रयास भी भुलाये नहीं जा सकते। मंदिर के अधोवर्ति परकोटे में संगमरमर की एक उतरी है, जिसे बीजी की बैठक कहा जाता है। सावनी फुहारों में हरियाली तीज के दिन यहां श्रीजी विराजती है। लगभग 250 फुट की ऊंचाई पर निर्मित अपने सर्वांग में यह मन्दिर अत्यंत भव्य, कलात्मक एवं विशाल है। यहां पूजा-अर्चना में हैं श्री नारायण भट्ट जी द्वारा स्थापित श्री विग्रह और सेवायत है नारायण स्वामी के जी के वंशज। बरसाने में एक द्वितीय दर्शनीय कलाकृति जयपुर मन्दिर के नाम से विख्यात है। निर्माता है जयपुर नरेश श्री माधोसिंह जी। बीलाडिली जी मन्दिर के समीप ही लगभग एक फर्लांग पर ब्रहमांचल के शिखर पर निर्मित इस मन्दिर में तीन श्री विग्रह हंसगोपाल जी, कुशलबिहारी जी और नृत्यगोपाल जी के दर्शन है। मंदिर व्यवस्था राजस्थान प्रशासन के देवस्थान विभाग की है। ब्रहमागिरी शिखर पर श्री लाहिली जी के मन्दिर के नीचे उतरकर श्री राधारानी जी के वादी-बाबा श्री महीभानु-सुखदा देवी के दर्शन हैं। विहारी सेठ के बगीचे से थोड़ा आगे वृषभानु बाया का मन्दिर है। विग्रह आदमकद है। यही महारानी कीर्ति और श्रीदामा भी विराजमान है। बाजार में लवानियां परिवार की हवेली से सटा हुआ श्री गोपाल जी का मन्दिर है। समीप में ही हनुमान मंदिर है।
अष्ट सखियों का मंदिर श्री वृषभानु मन्दिर के ठीक सामने है। बरसाना बाजार में एक मन्दिर ठाकुर बीयुगल किशोर जी का है। बरसाना में श्री लाडिली जी के मंदिर को खेडकर प्रायः सभी मन्दिर शिखर विहीन हवेलीनुमा भवनों के रूप में अवस्थित है। इन मन्दिरों की यह एक अपनी ही विशेषता है। रख-रखाव की दृष्टि से इनकी अत्यंत सोचनीय अवस्था है। यह स्थिति अध्यात्म जगत का विषय है। बरसाना का परिक्रमा मार्न आज भी जीर्णोद्धार के किसी सामूहिक प्रयास की प्रतीक्षा में है। वर्तमान में बरसाना घेरारमेज बलराज चौधरी ने जयपुर मंदिर से श्रीजी मंदिर परिकमा मार्ग का चौड़ीकरण करवाया है। वहीं गाडियों के मंदिर जाने वाले मार्ग का चौडीकरण भी करवाया। बरसाना के वतुर्दिक चार प्रमुख सरोबर हैं- पूर्व में भानु सरोवर अथवा भानीखर, इसके वायु कोण में कीर्ति सरोवर अथवा कीर्ति कुण्ड, नेत्रत्यकोण में बिहार कुष्णड अथवा तिल कुण्ड, इसके दक्षिण-पश्चिम में दाहिनीकुण्ड और पश्चिम स्थित इभाला गांव में रतन कुण्ड है। भाभोखर बाबा वृषभानु और कीर्ति महारानी के स्नान हेतु निर्मित सरोवर है। इसी के समीप कीर्तिजू का कुण्ड है। यहां सप्तराय युगल दर्शन है। गुंसाई जी द्वारा संपन्न सं० 1600 वि0 की प्रथम ब्रजयात्रा विवरण के अनुसार यहीं समीप में यशोदा कुण्ड भी था। बाबा वृषभानु जी के यहां छप्पन भोग में सम्मिलित होने के लिए बाबा नब्द जब यशोदा जी एवं रोहिणी जी के साथ कृष्ण-बलराम को लेकर बरसाने में आते थे, तब वे इसी कुण्ड के निकट डेरा डालते थे। भानोखर के समीपवर्ती क्षेत्र में ब्रजेश्वर महादेव नामक महारुद्र की प्राचीन मूर्ति के दर्शन है।

